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झंकार

इन्द्रधनुष के रंगों जैसी
तरंग एक उठ चली हो जैसे,
शीत पवन अचानक से
चल पड़ी हो कहीं से जैसे,
इठलाती सी, बलखाती सी,
झंकार एक आ चली कुछ ऐसे!
सुनी-सुनी सी होते हुए भी,
थी वह अंजान,
जाने कहाँ से आई थी,
स्वरों की वह झंकार?
वायु में तो फैल गई वो
मधुर सुगंध कोई जैसे,
घेर लिया उसने मुझे,
समा लिया, न जाने कैसे?
कर गई मन विचलित जो मेरा,
वह है शायद यहीं कहीं,
मन भावन सी वह झंकार
कही मेरे अंतर्मन की तो नही?

And this was my first attempt at writing something in Hindi! Although the first poem I ever wrote was in Hindi, but I found myself to be more comfortable composing something in English, and I left my mother tongue behind somewhere. But after a really looooong time I finally decided to give it another try, and I think I can use more of it in the coming days!